सोलर मॉडुल कैसे बनता है और ये कितने प्रकार के होते हैं? - MS3 Naveen Kumar

सोलर मॉडुल कैसे बनता है और ये कितने प्रकार के होते हैं?

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सोलर मॉडल (Solar Module)

हम सब ए अच्छी तरह से जानते हैं की सोलर मॉडुल (solar module) सौर ऊर्जा को विधुत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। पर सोलर मॉडुल कैसे बनता है, आखिर ये बिजली उत्पन्न कैसे करती है, यह सवाल हम सब के मन आता है। तो मैं आपको बता दूँ की सोलर मॉडुल में, सोलर सेल होता है जो की सिलिकॉन से बना होता है।

जब सूरज की किरणे इन सोलर सेल पे पड़ती है, इसके परिणाम स्वरुप सोलर सेल के इलेक्ट्रान p Type Silicon से N Type Silicon की तरफ प्रवाहित होने लगते हैं और इन्ही इलेक्ट्रान के प्रवाह से बिजली उत्पन्न होती है। एक सोलर मॉडुल बहुत सरे सोलर सेल होते है जो की आपस में जुड़े होते हैं।

अब आते हैं अपने आज के टॉपिक पे की सोलर मॉडुल कैसे बनता है। मार्केट में जीतने भी सोलर मॉडुल (Solar Module) मिलते हैं उनमे से ज्यादातर सोलर मॉडुल मोनोक्रिस्टलीन (monocrystalline) और पोलीक्रिस्टलीन (polycrystalline) होते हैं।  

सोलर मॉडुल कैसे बनता है
सोलर मॉडुल कैसे बनता है

सोलर मॉडुल कैसे बनता हैं ? (What are solar module made of?)

सोलर मॉडुल कैसे बनता है ये जानने से पहले हमें ये समझना होगा की आखिर सोलर मॉडुल में कितने परत होते है। तो मैं आपको बता दूँ सोलर मॉडुल में कुल 6 परत होते हैं। ये सभी परत मिलकर हीं इसे अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप बिजली उत्पन करने में सक्ष्म बनाते है।

ये 6 परत होते हैं : सिलिकॉन सोलर सेल्स (silicon solar cells), मेटल फ्रेम (metal frame), ग्लास शीट (glass sheet) और बस वायर (bus wire)। अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा की मैंने पहले बोला था की किसी भी सोलर मॉडुल (Solar Module) में 6 परत होते हैं और मैंने सिर्फ 4 के नाम हीं बताए है। तो ग्लास के कुल 3 परत होते हैं। अब अगर आप सारे परत को गिनेंगे तो 6 हो जायेंगे।

सोलर मॉडुल कैसे बनता है? तो हम ये कह सकते हैं की इन 6 परत के मिलने से सोलर मॉडुल बनता है। अब हम ये समझेंगे की आखिर ये 6 परत क्या काम करते हैं।

सिलिकॉन सोलर सेल्स (Silicon solar cells)

सिलिकॉन सोलर सेल फोटोवोल्टाइक (Photovoltaic) प्रभाव का उपयोग करके सूरज के प्रकाश से बिजली उत्पन्न करती है। सिलिकॉन सेल्स पतली कांच के वेफर शीट के बिच में होती हैं जो की मैट्रिक्स जैसी संरचना की तरह होती हैं, और जब सूरज की किरण इन सेल्स पे पड़ती हैं तो इनमे इलेक्ट्रान का प्रवाह होने लगता है और इन इलेक्ट्रॉन्स के प्रवाह के कारण बिजली उत्पन्न होती है।

मेटल फ्रेम (Metal frame)

मेटल फ्रेम एल्युमीनियम से बना होता है। अलुमिनियल जल्दी ख़राब नहीं होता है, इसमें जंग नहीं लगता है इसी कारण हम एल्युमीनियम का प्रयोग करते है। मेटल फ्रेम का मॉडुल में बहुत अहम् हिस्सा है, ये इन सोलर सेल्स को आंधी-तूफान से बचता है और सोलर मॉडुल को एक निश्चित एंगल में लगाने में भी मदद करता है।

ग्लास शीट (Glass sheet)

ग्लास शीट लगभग 6-7 mm  मोटा होता है। ये सिलिकॉन सेल्स को टूटने से बचता है। ग्लास के निचे एक इंसुलेशन केस होता है जो की सोलर मॉडुल (Solar Module) को नमी से बचता है, साथ हीं ए मॉडुल के तापमान को भी कण्ट्रोल करता है और तापमान को बढ़ने नहीं देता, जिसके कारन सोलर मॉडुल (Solar Module) के बिजली उत्पन्न करने की छमता काम नहीं होती है।

बस वायर (Bus wire)

बस वायर का प्रयोग सारे सिलिकॉन सेल्स को एक दूसरे से जोड़ने के लिए किया जाता है। इन्ही बस वायर के द्वारा बिजली एक सेल से दूसरे सेल में घूमते हैं।

सोलर मॉडुल कैसे बनता है
सोलर मॉडुल कैसे बनता है

सोलर मॉडुल (Solar Module) कितने प्रकार के होते हैं ?

सोलर मॉडुल 2 प्रकार के होते हैं।

  1. मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Monocrystalline Solar Module)
  2. पॉयक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Polycrystalline Solar Module)

मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Monocrystalline Solar Module)

मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Monocrystalline Solar Module), पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Polycrystalline Solar Module) की तुलना में जयादा अच्छे होते हैं। मोनोक्रिस्टलाइन वेफर्स का उत्पादन करने में स्किल्ड लेबर (Skilled Labor) की जरूरत होती है इसी कारण मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल, पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल की तुलना में जयादा महंगे होते हैं। 

मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडल लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के मॉडल होते हैं, इसी कारन ए कम धुप और ख़राब मौसम में भी काम करते हैं। मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडल में सेल काले काले रंग को होता है। और इसकी बिजली पैदा करने की छमता 18 प्रतिशत से 22 प्रतिशत तक होती है।

सोलर मॉडुल कैसे बनता है
सोलर मॉडुल कैसे बनता है

पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल (Polycrystalline solar Module)

पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल, मोनोक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल  की तुलना में कम कुशल होते हैं लेकिन इनको बनाने में काम खर्च होता है। इसी कारन ज्यादातर पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडुल का हीं प्रयोग किया जाता है।

भारत में जयादातर पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडल (Polycrystalline Solar Module) देखा जाता है। क्यूंकि इसकी कीमत मोनोक्रिस्टलीन की तुलना में कम होती है। पोलीक्रिस्टलीन सोलर मॉडल (Polycrystalline Solar Module) के सेल नीले रंग का होता है और इसकी बिजली पैदा करने की छमता 15 प्रतिशत से 17 प्रतिशत तक होती है। 

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डोपिंग (Doping) क्या है और सोलर सेल बनाने में यह कैसे काम करता है ?

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